मेरे संगीत की संक्षिप्त कहानी मेरी जुबानी (1995-2014), भाग 13-14

मेरे संगीत की संक्षिप्त कहानी मेरी जुबानी (1995-2014), भाग 13-14

कार्यक्रम का दिन आ गया और 5 jun 1995 को बैजा ताल के तैरते रंगमंच पर एक इतिहास बन गया “स्रष्टि का जन्म और प्रथम मानव ” नृत्य नाटिका को खचाखच भरे बैजाताल परिसर में जनता ने 48 degree तापमान में तपती हुई पटियों पर डेढ़ घंटे तक दम साध कर, पूर्णतह भारतीय शास्त्रीय नृत्य ,संगीत ,वेशभूषा और संस्कृति पर आधारित ,कार्यक्रम देखा,कार्यकर्ताओं को इस भीषण गर्मी में पानी का भी इंतजाम करने का ध्यान नहीं रहा लेकिन किसी दर्शक ने इसकी कोई परवाह तक नहीं करी .
सारे प्रशासन ,नगर की समस्त कला संस्थाओं ,समस्त राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने दलगत भावना से दूर हो कर अभूतपूर्व सहयोग किया ,उन्हें मेरे कार्य और कला के प्रति समर्पण पर पूरा विशवास था अतः मैं इतने बड़े भागीरथी प्रयास में सफल हो पाया .
इस भागीरथी प्रयास में मैं अपनी पत्नी श्रीमती कुमकुम सिंह ,श्रीमती शांता वारियार ,मेरे पुत्र परिवेश सिंह ,पुत्री मनीषा सिंह ,उज्जैन के संगीत कलाकार ,प्रसिद्ध कत्थक नर्तक श्री भगवान दास महाडिक और उनकी पत्नी मोहिनी महाडिक वो तीन सौ लड़के लडकियां,पचास से ज्यादा गायक गायिकायें और वादक , जिन्होंने चार महीने तक अतुल्यनीय परिश्रम कर के अभ्यास किया ,भारत भवन भोपाल के Light and sound के मेरे शिष्य श्री दास और कला समूह के तकनीशियनों ,नेहरु युवा केंद्र के प्रभारी श्री रम्मी भारती तथा उनके पांच सौ कार्यकर्ताओं तथा सैकड़ों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े नगर के समाचार पत्रों के आदरणीय संवाद दाता तथा गणमान्य नागरिकों के अकल्पनीय परिश्रम से मैं अपने आराध्यों के आशीर्वाद तथा कृपा से सफल हो पाया .
इसके बाद 1996 में मैंने तत्कालीन जिलाधीश श्री सूर्य प्रताप सिंह के अनुरोध पर फिर बैजाताल के तैरते रंगमंच पर तीन दिवसीय ग्वालियर कला महोत्सव प्रस्तुत किया ,जिसमे मेरे द्वारा लिखे चतुर्युग नृत्य नाटिका के साथ ही मालती माधव नाटक तथा विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये ,जिसने फिर अपार सफलता के नये आयाम लिखे .
मित्रों इसके बाद मैं रूपसिंह स्टेडियम में पंद्रह सौ कलाकारों के साथ अपने लिखे हुए सूर्य परिक्रमा नृत्य नाटिका को प्रस्तुत कर के विश्व की विशालतम नृत्य नाटिकाओं में से एक देना चाहता था जिसके लिये पूरा नगर प्रशासन ,विश्व विद्यालय और नगर की सारी शिक्षा संस्थायें पूर्ण सहयोग देने को तैयार थीं पर स्टेडियम में क्रिकेट की पिच बनी होने के कारण नगर की क्रिकेट संस्था ने इसे होने नहीं दिया .
कुछ सालों बाद कंप्यूटर युग का आरम्भ हो गया और मैं फिर कंप्यूटर से संगीत बनाने और शहर में फिर कुछ नया लाने के प्रयास में जुट गया .
इस विशाल कार्यक्रम की एक सबसे ख़ास बात ये भी थी कि मैंने सरकार या किसी भी व्यक्ति और संस्था से आर्थिक रूप से एक पैसे की भी मदद नहीं ली और अनुमानतः तीन लाख रुपये की कार्यक्रम की लागत को तमाम कठिनाइयों के बावजूद स्वयं ही वहन किया