मेरे संगीत की संक्षिप्त कहानी मेरी जुबानी (1972), भाग 11

मेरे संगीत की संक्षिप्त कहानी मेरी जुबानी (1972), भाग 11

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1972 नवम्बर की मेरे द्वारा प्रस्तुत की गयी शहर की प्रथम रंगीन संगीत रात्रि ने संगीत कार्यक्रमों की दिशा बदल दी ,उसकी अपार सफलता ने कई लोगों के मन में ये भी ख्याल लाया कि अजीत सिंह ने इस कार्यक्रम में बहुत पैसा कमाया है जबकि वास्तविकता इससे बिलकुल अलग थी ,पैसे का विभाग मैंने निर्मल जादवानी को सौंपा हुआ था,उन्होंने पैसे का किया मुझे कुछ होश नहीं था ,मुझे ये भी मालूम नहीं था कि कितना पैसा आया और बाद में उलटा मैं उस कार्यक्रम में हुए बेहिसाब खर्चों का महीनों अपनी जेब से भुगतान करता रहा .
स्वार्थी और व्यापारिक बुध्धि वाले ग्रुप के कलाकारों की लार घुटनों घुटनों तक टपकने लगी और अंततः उन्होंने मेरे लिये अकल्पनीय, मेरे साथ विश्वासघात कर के सरदार इन्द्रपाल का इस्तमाल कर के मेरे ही वाद्यों और मेरे बनाए हुए कलाकारों और ग्रुप को ले कर एक दूसरा ग्रुप बना लिया जिसमें सिर्फ मैं नहीं था बाकी सब कुछ वैसा ही था .
तात्कालिक रूप से उस समय मुझे बहुत दुःख हुआ और हर तरह का नुक्सान भी हुआ मैं शहर और संगीत के लिये जीता था और आज भी हूँ उन्होंने ऑर्केस्ट्रा का व्यवसायीकरण कर दिया ,मेरी ज़िंदगी का वो जिन्हें मैं अभिन्न मित्र मानता था ,उनके द्वारा दिया हुआ पहला विश्वासघात और अनुभव था .
सरदार इन्द्रपाल अपने साथियों डैरिक अलेक्सेंडर और नलिन दबे के साथ कुछ सालों बाद पहले दिल्ली फिर मुंबई चले गये ,वो लोग मेहनती थे और कुछ करने की चाह रखते थे ,उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से आकाश की ऊंचाइयों को छुआ पर विश्वासघाती ना इधर के रहे ना उधर के और लौट फिर के फिर मेरे पास आये लेकिन अबकी पैसे के लिये .
कालान्तर में मैं फिर उठ खड़ा हुआ और दूसरे नये तथा कुछ पुराने कलाकारों जो इधर उधर दोनों तरफ डोल रहे थे क्योंकि उन्हें सिर्फ पैसा चाहिये था, को तैयार कर के फिर 1972 oct.nov. दूसरी “कल आज कल ” के नाम से विशाल रंगीन संगीत रात्रि दी और थोड़े थोड़े सालों के अंतर से फिर मैंने ” Dance in tears. शीश और शमा, आदि जैसी कई संगीत रात्रियाँ प्रस्तुत करीं .
इतने सालों के अनुभव ने मुझे सिखा दिया कि शहर में दो चार कलाकारों से काम नहीं चलेगा एक नये कलाकार बनाने की एक परम्परा शुरू करनी पड़ेगी ,तब मैंने 1972 से ही संगीत कक्षायें शुरू करीं ,पर समस्या यहाँ भी थी शहर में किसी संगीत वाद्यों की दुकान पर गिटार नहीं मिलते थे ना ही कोई रखना चाहता था वे सिर्फ हारमोनियम ,तबला और भारतीय वाद्य ही बेचते थे ,मैंने इसका हल निकाला और सुविख्यात Violin maker श्री जी.सी सिंह जी को गिटार बनाने के लिये राजी कर लिया ,फिर वो लम्बे समय तक गिटार बना बना कर बेचते रहे,पर क्वालिटी नहीं मिल रही थी अतः मैंने दुकानदारों को Branded गिटार रखने के लिये प्रेरित किया ,तब तक शहर में इन वाद्यों का बाज़ार बन चला था अतः दुकानदार राजी हो गये और शहर में अच्छे गिटारों और वाद्यों का मिलना शुरू हो गया .
मैं फ़िल्मी संगीत प्रस्तुत करते करते ऊब चुका था अतः 1986 में मैंने फ़िल्मी संगीत पूरी तरह से नहीं छोड़ा पर रंगमंच के फ़िल्मी कार्यक्रमों से संन्यास ले लिया .